हंसी सबसे बड़ा हथियार है,आजमाकर देखिए

कल रात खाना खाने के बाद मैं टहलने निकल गई ।वाॅक के बाद जब वापिस आ रही थी तो मेरे कानों में जोर -जोर से बोलने की आवाजें पड़ीं ।मैं मुड़कर आवाज की तरफ देखा। बाइक पर एक युवा पति-पत्नी आ रहे थे।पति चिल्लाया-” ज्यादा बकवास मत कर ,यहीं पटक दूंगा।”

पत्नी भी गुस्से से बोली- ” मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ ।आगे मोड़ पर उतार दो ”

युवती का इशारा मुख्य सड़क की ओर था जो वहाँ से लगभग सौ कदम दूरी पर थी।

युवक ने तुरन्त ब्रेक लगाए और गुस्से से बोला -“यहीं उतर।”

युवती उतरी नहीं ,हंस पड़ी और बोली- मोड़ तक तो ले चलो वहाँ उतार देना।

युवक का गुस्सा भी काफूर हो गया ।वह भी हंस पड़ा- उतर जाती तो पता चलता यहाँ आॅटो भी नहीं मिलता।

दोनों हंसते हुए चले गये। मुझे भी हंसी आ गई।

हंसी में बहुत ताकत है। दोनों की बहस जो एक बड़े विवाद को जन्म दे सकती थी हंसी के कारण टल गई ।हमारे जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब मतभेद होने पर हम इतने अहम् ग्रस्त हो जाते हैं कि सामने वाले में कमियां ही कमियां देखते हैं। हम भूल जाते हैं कि एक हाथ से ताली कभी नहीं बजती। आपस की छोटी सी बहस जो सिर्फ़ एक मुस्कान से हल हो सकती थी वह अहंकार से पोषित होकर स्थिति को मतभेद से मनभेद तक पहुँचा देती है। इसलिए हंसी को हथियार बनाइए। क्रोध, घृणा, वैमनस्य और उपेक्षा की तुलना में हंसी निस्संदेह अमोघ शस्त्र है

Advertisements

अविस्मरणीय लम्हे

27 सितम्बर को मेरा जन्मदिन था। हम 11 स्टाफ मैंम्बर्स इकट्ठा बैठती हैं । स्कूल का स्टाफ़ भी बड़ा है चार जगह बैठता है। हमारी एक सहेली लिपिक है।वह काम में व्यस्त थी तो उसने कहा कि खाने का सामान वहीं भिजवा दो और यहाँ चार लोग और हैं एक्सट्रा भिजवा देना। जैसे ही वे लोग खाने लगे तीन चार सदस्य दैवयोग से आॅफिस में आ गए। सबने मुंह मीठा किया ।हमने पार्टी शुरू की तो दो सदस्य वहीं बधाई देने पहुँच गए। मैने उनका मुंह मीठा करवाया तो उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया । बात उड़ते -उड़ते दूसरों तक पहुँच गई मधु मैडम का फोन आया और पार्टी में शामिल न करने का उलाहना दिया । पनीर की जलेबी रखी थी भिजवाकर उनका मुंह मीठा करवाया तो तीसरे स्टाफ रूम से फोन आया कि हमें ही क्यों छोड़ दिया ।चपरासी को भेजकर फिर बाकी बचे सभी सदस्यों के लिए जलेबी मंगवाई ।सबने बधाई और आशीर्वाद दिया।

शाम को माँ के घर डिनर था।भाभी ने हलवा बनाया भतीजे -भतीजी ने केक ला रखा था। केक काटकर सबने मेरा जन्मदिन मनाया।घर पहुँचे तो बेटे जो बैंगलोर है की तरफ से सरपराइज था एक बहुत सुंदर केक मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।

सारा दिन फेसबुक और वहाट्सएप पर मित्रों और रिश्तेदारों और परिजनों ने ढेरों आशीर्वाद दिया। यह जन्मदिन मेरे लिए अविस्मरणीय बन गया जिसमें मुझे इतनी दुआएं मिली कि शुक्रिया के रिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं।

शक हमेशा गरीब पर ही क्यों जाता है

घटना -एक

मीना की भतीजी की शादी थी।भात की रस्म पर उसने लालरंग की साड़ी पहनी और साथ में सोने का सैट। जयमाला का वक़्त हो चुका था ।वह घर साड़ी बदलने आई तो कमला सफाई के लिए आ गई।मीना ने साड़ी चेंज कीऔर सोने का दूसरा सेट पहन लिया।कमला भी काम करके चली गयी। अगले दिन जेवर संभालने लगी तो उसे सुबह वाला सैट नहीं भिला।सारा घर छान मारा पर सैट का अता-पता नहीं मिला।उसका दिमाग चकरा गया ।उसे ध्यान आया किउस वक्त कमला आई थी सैट तब बेड पर था।कमरे में पोंच्चा लगाते हुए कमला ने पीने का पानी मांगा था।जब वह पानी लाने गई तो पीछे से जरूर कमला ने ही हाथ साफ किया होगा। दिमाग में एक के बाद एक दृश्य जुड़ता चला गया कमला के चोर होने का ।पर उसे कमला की झुग्गी का पता नहीं था सो वह कुछ कर नहीं पायी।डांट के डर से पति को भी नहीं बताया। सारी रात वह बेचैनी में करवटें बदलती रही। उसे लग रहा था कमला तो जरूर शहर छोड़कर भाग गई होगी।अगले दिन नियत समय पर कमला काम करने आई।मीना तत्परता से बोली-कमरा कल मेरा सैट बेड पर रखा था देखा क्या?

“नहीं मैडम जी”

“था तो आरटीफिशियल,पर मुझे पसंद था।कल जहाँ कूड़ा फेंका था देखकर आ,मिल गया तो तुझे पांच सौ रूपये दूंगी। ” मीना ने नकली सैट की बात बनाते हुए कहा ताकि कामवाली के मन में कोई लालच न रहे।

“नहीं मैडम जी,मैं कूड़ा चैक करके डाल कर आई थी।”

मीना को पक्का विश्वास था कि सैट जरूर कामवाली ने ही चुराया है।दो दिन निकल गए। मीना बैड पर बैठी थी । उसे ठंड महसूस हुई तो ओढ़ने के लिए चद्दर निकालने लगी तो उसका ध्यान जूतों के रैक पर पड़ा।

और उसके दिमाग की बत्ती जल गई। उसे ध्यान आया कि जल्दी होने के कारण वह सैट को अपने स्पोर्ट्स शूज में रखकर चली गयी थी ।उसने शूज के अंदर देखा सैट वहीं था।अब उसे पश्चाताप हो रहा था कि उसने क्यों कामवाली पर शक किया।

घटना- दो

मीरा ने स्कूल से आकर मुंह धोते हुए घड़ी बाथरुम में उतारकर रख दी। उसी दिन फ्लश के टैंक में लीकेज थी ।पति मोहित ने प्लम्बर को बुला लिया सुबह स्कूल जाते हुए घड़ी ढूँढी तो कहीं नहीं मिली।घर आकर पुनः ढूँढने पर भी घड़ी नहीं मिली ।पति से पूछा तो बोले-बाथरूम में थी ले गया होगा मजदूर।संभाल कर तो रख नहीं सकती।

पति से डांट खाकर अनमने मन से वह टी.वी .चलाने लगी तो देखा घड़ी और चूड़ियां टी.वी . की ट्राॅली में रखी थी जिन्हें शायद वह मुंह धोने के बाद आते हुए उठा लाई थी।

दोनों घटनाएं बताती हैं कि शक हमेशा गरीब पर जाता है ।उस वक़्त हम स्वार्थ में इतने अन्धे हो जाते हैं कि इन लोगों का पहले का सद्व्यवहार गौण हो जाता है।हम भूल जाते हैं कि गरीब मजदूर चाहे अनपढ़ हो चाहे धनहीन हो पर चोर नहीं है। फटे -पुराने कपड़ों में भी उसका हृदय कुंदन सा हो सकता है।

उस पल पर मुझे गर्व भी हैऔर मैं शर्मिंदा भी हूँ

तब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी छोड़कर सामाजिक व राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करने लगे थे ।फलस्वरूप मेरी माँ अकेले खेती-बाडी संभालती थी। घर में छः गाय ,भैंस,बैल आदि पशु भी थे जिनके लिए माँ को सिर पर रखकर चारा लाना पड़ता। वे तीन-चार चक्कर पैदल खेत के लगाती और चारा लातीं।हम चारों भाई -बहन पढ़ते थे। स्कूल से आकर और छुट्टी वाले दिन हम माँ का हाथ बंटाते।

खेत में बाजरे की फ़सल तैयार हुई तो उसकी दानों वाली सिरटियां तोडकर गांव के पास खलिहान में डालकर तीन-चार दिन सुखानी पड़ती थी फिर बैलों के पीछे गिरड़ी बांधकर उन्हें गाहा जाता इससे दाने बाहर आ जाते फिर हवा में बरसाकर दाने और बुलबला अलग किया जाता। इस चार -पाँच दिनों की प्रक्रिया में सिरटियों की सूअरों के खाने से बचाने के लिए एक व्यक्ति को दिन-रात रखवाली करनी पड़ती थी ।

उस बार भी सिरटियां खलिहान में थी।।माँ को चारा लाने खेत में जाना था ।माँ ने मुझे स्कूल से छुट्टी करने के लिए कहा परन्तु मैंने स्कूल जाने की जिद की।माँ ने गुस्से में मुझे एक थप्पड़ लगा दिया पर मैं स्कूल गई। हालांकि आधी छुट्टी होते -होते मुझे अपराधबोध ने घेर लिया कि मुझे माँ की मदद करनी चाहिए थी।तब मैं आधे दिन का अवकाश लेकर घर आई और माँ खेत से चारा लाईं। आज सोचती हूँ तो मुझे गर्व होता है कि पढ़ाई के प्रति ललक ही मेरी उच्च शिक्षा का आधार बनी।

खुश रहने के उपाय

जीवन भगवान् का दिया एक खूबसूरत किंतु अनिश्चित तोहफा है। जीवन सौ साल का भी हो सकता हैऔर अगले पल भी समाप्त हो सकता है। कितना जिएंगे हमारे हाथ में नहीं परन्तु जितना जीएंगे उसे खुशी से जीना हमारे हाथ में अवश्य है । खुशी -गम,हार-जीत,मान-अपमान जीवन के अस्थायी लम्हे हैं। खुशी एक पल में मातम में बदल सकती है, अपयश यश में बदल सकता है ,जीत हार में बदल सकती है और आंसु मुस्कान में बदल सकते हैं सब परिवर्तनशील हैं। परन्तु एक बात है जीवन है तो हार- जीत, मान- अपमान , लाभ- हानि हैं जीवन ही नहीं तो फिर इनका भी औचित्य नहीं। इसलिए हमारा दृष्टिकोण भी जीवन को सर्वोच्च मानने का होना चाहिए।

कई बार हम अपने अहम् को इतना पुष्ट कर लेते हैं कि जीवन की श्रेष्ठता क्षीण हो जाती है और अहम् को संतुष्ट करते-करते जीवन को दुःखों का घर बना लेते हैं। तब दुःख तनाव और निराशा हमारी नियति बन जाता है।जीवन को उल्लासपूर्ण बनाने के लिए अहंकार और स्वाभिमान में अन्तर करने की विवेकशक्ति हमारे पास होनी चाहिए।

मन चंचल भी हैऔर सुखाभिलाषी भी है इसलिए मन में विचार आते ही तुरंत क्रियान्वयन नहीं करना चाहिए अपितु अपने अन्तर्मन में जाकर निर्लिप्त होकर सोचना चाहिए अन्दर से सही निर्णय आएगा और उस निर्णय से खुशी भी मिलेगी।

हम सामाजिक प्राणी हैं और अपने परिवार और समाज के लिए कर्त्तव्यबद्ध हैं किंतु हम अपने जीवन के लिए भी कर्त्तव्यबद्ध हैं। दूसरों के प्रति कर्त्तव्यपालन श्रेष्ठ मानवीय गुण है किन्तु कर्त्तव्यपालन में खुद की आहुति भी न दें। अगर आपके त्याग की कद्र नहीं तो यही त्याग आपकी कमजोरी समझा जाएगा।

जीवन से प्यार करें ,इसमें अपनी रुचियों के रंग भरें , दूसरों के लिए करते हुए अपने लिए भी जीना सीखें, अपने लिए वक़्त निकालें ,ख्वाब देखें और ख्वाबों को पूरा करने लिए प्रयासों की उड़ान भरें। आप हैं तो सब कुछ है।

जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं त्योहार

मेरे घर से एक गली छोड़कर बड़े भाई का घर है। आज रक्षाबंधन के दिन हम वहाँ निमंत्रित थे। छोटे भाई-भाभी अपने तीन बच्चों के साथ वहीं आए हुए थे त्योहार के दिन हम सब भाई बहन माँ के पास बड़े भाई के घर में इकट्ठा होते हैं। राखी बांधने के बाद भोजन की बारी आई ।तब तक बड़ी भाभी के भैया-भाभी भी अपनी बेटी के साथ आ गए। भाभी ने खीर ,आलू वाली पूरियांऔर छोले बनाए थे ।भोजन बहुत ही स्वादिष्ट था ।हंसी मजाक ने भोजन के स्वाद को द्विगुणित कर दिया। भोजन करके बैठे ही थे कि ताऊ जी का छोटा बेटा प्रदीप ,उसकी पत्नी संतोष,बेटा युवराज और बीच वाली भाभी सुमित्रा आ गए। भाभियों से थोड़ा मसखरे,भतीजे-भतीजियों के लाड़ बहुत अच्छा लगा।बहुत दिनों बाद जीवन की भागम-भाग और तनाव से मुक्त दिन मिला जो मन को नई ऊर्जा दे गया।

बोझ

विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस को’ बेटी का सलाम राष्ट्र के नाम’ के रूप में धूमधाम से मनाया गया। गांव की सर्वाधिक शिक्षित बेटी ने ध्वजारोहण किया। पिछले एक साल में पैदा होने वाली बालिकाओं और उनकी माताओं को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम में विज्ञान अध्यापक दीपक खुराना ने लैंगिक असमानता को छोड़कर लड़का-लड़की को विकास के बराबर अवसर देने पर बड़ा सारगर्भित भाषण दिया। भाषण के उपरान्त उनके फोन की घंटी बज उठी ।फोन उनकी पत्नी का था।पत्नी ने बताया-बहू के दूसरी बेटी हुई है। दीपक खुराना का चेहरा मलिन हो गया। ओज पूर्ण भाषण जाने कहाँ गायब हो गया दूसरी पोती उन्हें बोझ प्रतीत होने लगी और वे पराजित योद्धा से धम से कुर्सी पर बैठ गए।