छोटी छोटी बातें खुशियों की बड़ी सौगातें

वर्ष 2018 के अगस्त माह में मैं प्रतिलिपि एप पर हिन्दी में कहानी लिखना शुरू किया था और अब तक मैं 51 कथाएँ और लघुकथाएं वहाँ पब्लिश कर चुकी हूँ ।उनमें से मेरी कहानी बस यूँ ही को 30580 (thirty thousand five hundred n eighty )views मिल चुके हैं ।किसी रचना को पाठकों का स्नेह मिलना लेखन को सार्थक कर देता है ।हृदय में एक आनन्द की गहरी अनुभूति होती है।ऐसा ही आनन्द उस समय महसूस होता था जब हम परीक्षा देते थेऔर प्रथम स्थान प्राप्त करते थे।शुक्रिया सभी पाठकों का जो मेरी रचनाओं को पढ़ते हैं ,पढकर पसन्द करते हैं और समीक्षा करते हैं ।पाठकों की समीक्षा मुझमें एक नई ऊर्जा का संचार करती है।

हार्दिक शुक्रिया दोस्तों

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कुप्रथाओं का बोझ कब तक ढोते रहेंगे

कमला विधवा है।बीस वर्ष पूर्व उसके पति ने आत्महत्या कर ली ।तीन बेटी और एक बेटे की परवरिश का बोझ उसके कंधों पर आ गया । पति की मृत्यु के समय बड़ी बेटी की उम्र बारह वर्ष और बेटा दो वर्ष का था ।गुजारे के लिए उत्तराधिकार में सिर्फ एक एकड़ जमीन मिली । कमला ने भैंस पाली दूध बेचा,दूसरों के खेतों में मजदूरी करके बच्चों की परवरिश की और विवाह किया ।

कुछ दिन पहले उसके 80 वर्षीय ससुर का देहान्त हो गया।मृत्युभोज पर उसके देवरों ने जलेबी बनाने का फैसला किया । देवर भी निम्न मध्यम वर्ग के थे ।परन्तु सामाजिक दबाव में मिठाई बनाना जरूरी समझा गया । खर्च का हिसाब लगाया गया तो तीनों के हिस्से 12-12हजार रूपये आए। देवर कमला के पास बारह हजार रूपये मांगने आया तो कमला ने कहा कि अभी तुम दे दो ,मैं दो तीन महीने बाद लौटा दूंगी ।देवर के पास भी रूपये नहीं थे ।कमला ने दो रूपये सैंकड़ा के हिसाब से कर्ज लिया अर्थात् 24%वार्षिक दर जो चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से गिना जाएगा। कमला का बेटा बारह हजार रूपये महीना कमाता हैऔर कमला को दो हजार रूपये विधवा पेंशन मिलती है ।घर में पाँच सदस्य हैं ।तीन विवाहित बेटियों और छ:ननदों का आवागमन भी लगा रहता है।

मृत्यु के समय आवागमन दुःख बांटने के लिए बनाया गया था।दूर दराज से आने वाले रिश्तेदार रात को रूकते थे क्योंकि यातायात के साधन सुलभ नहीं थे।इन रिश्तेदारोंके लिए भोजन की व्यवस्था होती थी ।परन्तु समय के साथ यह प्रथा कुप्रथा बन गई और प्रदर्शन की भेंट चढ़ गई।आज मृत्यु पर विवाह की तरह शानदार भोज होता है ,मिठाइयां बनती हैं ,लड़की वालों को बेटी और दामाद के लिए जेवर लाने पड़ते हैं ।हजारों से लेकर लाखों रूपये की पगड़ी दी जाती है लोग कर्ज उठाते हैं,जमीन गिरवी रखते हैं परन्तु इन कुरीतियों को ढोते है।

समाज आखिर कब तक इन झूठे प्रपंचों में फंसा रहेगा?कब तक समाज मृतकों के चक्कर में इंसानोंको जिन्दा लाशों में बदलता रहेगा?

जब जिंदगी बोझ बन जाए

जीवन कोई फूलों की सेज नहीं ,कांटों की चुभन भी है।जिंदगी केवल कहकहों का उल्लास नहीं, हृदय का करूण रूदन भी है।जिन्दगी सिर्फ सफलता का जश्न नहीं, असफलता का क्रन्दन भी है।जिंदगी सिर्फ मिलन का संयोग नहीं, आहों भरा बिछुड़न भी है। जीवन पथ पर चलते-चलते कई बार निराशा और असफलता का अंधकार इतना स्याह हो जाता है कि हिम्मत जवाब दे जाती है ।जीवन बोझ लगने लगता हैऔर निराश मन सोचने लगता है ऐसे जीवन का क्या फायदा? मस्तिष्क में कहीं न कहीं पलायन या यूँ कहें आत्महत्या का कीड़ा कुलबुलाने लगता है ।ऐसी स्थिति जब भी जीवन में आए तो इन बातों को जरूर आजमा लेना चाहिए-

1. आत्म-चिंतन करें- समस्या के सभी पहलुओं पर चिंतन करें ।परन्तु चिंतन निर्लिप्त होकर करें ।यानि समस्या को सिर्फ समस्या मानें, मेरी समस्या नहीं ।इस तरह आप सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर समस्या के सभी पहलुओं और समाधान की संभावनाओं पर विचार कर पाएंगे ।

2 विश्वासपात्र से डिस्कस करें- जब मन हार मान लेता है समाधान नहीं खोज पाता ।ऐसी स्थिति में किसी विश्वासपात्र से बात शेयर करें ।लोगों को पता लगेगा तो बेइज्जती हो जाएगी, मैं लोगों को क्या मुंह दिखाऊँगा इस तरह के फोबिया दिमाग से निकाल दें ।सबके जीवन में उतार चढ़ाव आतेहै ।इसलिए खुलकर शेयर करें ।समस्या का हल न भी मिला तो मन जरूर हल्का हो जाएगा ।

3 समस्या का उत्तरदायी पहचानें- अन्तर्मन में विचार करें कि समस्या आपके गलत निर्णय की वजह से हुई है या दूसरा द्वारा किए गलत व्यवहार और शोषण से हुई है।आपके निर्णय गलत थे तो जिम्मेदारी स्वीकार कीजिए ।जिम्मेदारी स्वीकारने से आत्मबल में वृद्धि होगी और बेहतरीन ढंग से मुकाबला कर पाएंगे ।अगर आपकी तकलीफ का कारण दूसरा है तो स्पष्ट शब्दों में जवाब दीजिये क्योंकि दूसरा आपके बारे में निर्णय इसलिए ले रहा है क्योंकि आप अपने फैसले नहीं ले रहे हैं ।दूसरा आपका शोषण कर रहा है क्योंकि आपने विरोध नहीं किया है ।

4 कहीं घूमने निकल जाएँ- अवसाद,तनाव और निराशा से बचने का यह एक उत्तम उपाय है।एक भ्रमण का प्रोग्राम बनाएं ।जिन लोगों से आपको दिक्कत है कुछ दिनों के लिए उनसे दूर हो जाएं।जिन लोगों की बातें और व्यवहार आपमें नई ऊर्जा भरता हो उनके साथ हफ्ते- दस दिन का घूमने का कार्यक्रम सकारात्मकता से भर देगा।इन दिनों में समस्या या सम्बंधित व्यक्ति का भूलकर भी जिक्र न करें ।

5 अपनी रूचि के काम करें-

जिम्मेदारियां भूल जाएं ।आप नहीं होंगे तब भी सब काम पूर्ण होंगे ।अपने लिए थोड़ा स्वार्थी बनें।जो आपकी हाॅबिज हैं वे पूरी करें ।म्यूजिक सुनें , वाॅक पर जाएं जो करने का मन करें बस वही करें ।रिलेक्स रहने का मूड है तो रिलेक्स रहें ।तनावग्रस्त होकर जिम्मेदारी का बोझ न ढोएं।

6 लिखें- अपनी समस्या किसी से शेयर नहीं कर सकते तो उसे लिखें । आपके द्वारा लिखा हर शब्द आपकी पीड़ा के बोझ को हल्का करता जाएगा ।मन की सारी भड़ास निकाल लीजिये ।गाली देने का मन हो तो वो भी लिखिए ।जब सब लिख लें एक बार उसे पढ़ें और फाड़ दीजिये ।बात बाहर भी नहीं गई और बोझ भी हल्का हो गया ।

7 ऐसी तैसी- मेरी जिंदगी भगवान का दिया उपहार है और उसे ही इसे वापिस लेने का हक है ।बाकी दुनिया की ऐसी तैसी । दोहराइए-जीवन एक बार मिला है मुझे अपना बेहतरीन पार्ट अदा करना है।

8 स्वास्थ्य का ध्यान रखें- तनावग्रस्त होकर खाना छोड़ना मूर्खता है ।किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा ।रूग्ण शरीर सिर्फ आपको तकलीफ देगा।संतुलित भोजन आपमें नई उमंग व रचनात्मकता देगा ।

9 अन्त में यह विश्वास रखिए आप दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंसान हैं तभी तो परमात्मा नेआपको बनाया है।आप सामर्थ्यवान हैं तभी तो नियति ने आपको चुना है संघर्ष के लिए ।

आपकी प्रतिक्रिया मेरे लेखन की ऊर्जा है।कृपया उत्साहवर्धन करते रहिए। नमन

माँ बस माँ होती है

मेरे घर के पास एक कुतिया ने छ: पिल्लों को जन्म दिया ।अब उनमें से चार जिंदा हैं और लगभग 6-7महीने के हो चुके हैं ।वे कुतिया के साथ अक्सर सड़क के किनारे बैठे रहते हैं ।आस पड़ोस के लोग उन्हें बची रोटियाँ,भात डाल देते हैं ।मैं भी बची रोटियाँ,मक्खन निकालने के बाद बची लस्सी और कभी-कभी उन्हें बिस्कुट डाल देती हूँ ।मैं रोटी के टुकड़े करके सबके सामने डालती हूँ ।परन्तु कई बार जब कुतिया के सामने रोटी डालती हूँ तो पिल्ला उसके पास आ जाता है ।वह अपने हिस्से की रोटी छोड़ देती है और पिल्ले को खाने देती है।लगभग हर बार कोई न कोई पिल्ला उसकी रोटी उठा लेता है और उसे कई बार एक टुकड़ा भी नहीं मिल पाता ।वह शांत भाव से पिल्लों के पास खड़ी रहती है।

ममता इसी का नाम है अपना हिस्सा भी खुशी खुशी बच्चों को दे देना ।यह प्रवृत्ति हर माँ में है।चाहे वह माँ पशु हो, पक्षी हो या महिला हो।मेरी माँ भी अक्सर घर आए फल नहीं खाती ।उसकी कोशिश रहती है कि बच्चे खा लें।जब तक फल खराब न होने लगे तब तक वह दूसरों को खिलाने की कोशिश में रहती है ।शायद माँ के मां होने का यही राज है।

कछुआ अवश्य जीतेगा

सोलह वर्षीय अशोक प्लस वन का विद्यार्थी है।शरीर से दिव्यांग है।हाथ -पैर,चेहरा थोड़ा असामान्य है।परन्तु कुछ बातें उसे दूसरों सेअलग करती हैं ।एक बार एक प्राध्यापिका की एक्टिवा स्टार्ट नहीं हो रही थी ।सभी स्टाफ मैबर पास से गुज़र गए ।विद्यार्थी भी पास से गुज़र रहे थे। परन्तु किसी ने सहायता नहीं की ।तभी अशोक बोला -मैडम जी,मैं स्टार्ट कर दूं?

प्राध्यापिका हिचकिचाहट से बोली-बेटा तू कैसे?

“मैडम,मैं कर दूंगा ।”उसने सच में ही एक्टिवा स्टार्ट कर दी।

दूसरी बार वह ध्यान में तब चढ़ा जब उसका वाॅलेट चोरी हो गया जिसमें 2200रूपये थे।जब उससे पूछताछ की गई कि इतने रूपये कहाँ से आए तो आश्चर्यजनक बात सामने आई- घर का सारा हिसाब किताब वह करता है ।सामान भी वह लेकर आता है ।विकलांगता कहीं बाधक नहीं ।

ती सरी बार आकर्षण का केन्द्र वह तब बना जब जिला स्तर की दिव्यांग प्रतियोगिता में उसने गाने में द्वितीय व गोला फेंक प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया ।जिला उपायुक्त हिसार ने अपने कर कमलों से उसे सम्मानित किया।

अशोक दिव्यांग अवश्य है परन्तु उसकी शारीरिक अक्षमता कभी उसकी राह में बाधा नहीं बनती ।सब स्वस्थ बच्चे जब तक सोचते हैं तब तक वह काम कर देता है।पढाई में थोड़ा कमजोर अवश्य है परन्तु पीरियड लगाने सबसे पहले उपस्थित होता है ।उसको देखकर मुझे हमेशा खरगोश व कछुए वाली कहानी याद आती है ।मेरा मन कहता है ये कछुआ अवश्य एक दिन रेस जीतेगा।

उसने कहा था

बात 1986 की है ;मैं तब दसवीं कक्षा में पढ़ती थी।हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम में से दो रचनाएँ मुझे बहुत पसंद थी एक तो बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता ‘विप्लव गान ‘और दूसरी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’।

‘विप्लव गान ‘की ये पंक्तियाँ मेरी पसंदीदा पंक्तियाँ थी-

कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ

जिससे उथल पुथल मच जाए

इक लहर इधर से आए

इकलहर उधरसे आए

. ………………

नियम उपनियमों के सब बंध

टूक टूक जाएँ

विश्वंभर की पोषक वीणा के

सब तार मूक हो जाएँ

आज भी जब मैं किसी असहाय का शोषण देखती हूँ, अन्याय देखती हूं मेरा मन बगावत पर उतर आता है और तब मेरे मुंह से जो निकलता है वह अपने पराए का भेद भुलाकर कड़वा सच ही निकलता है।

‘उसने कहा था’ कहानी मैंने बहुत बार पढी थी तब ।दसवीं के विद्यार्थी के मानसिक स्तर के हिसाब से कहानी थोड़ी मुश्किल है।परन्तु कहानी में कुछ ऐसा है जो बार बार पढ़ने को मजबूर कर देता है।बड़े होकर हिन्दी साहित्य में एम फिल भी कर ली ।बार -बार जिक्र आता रहा कि’ उसने कहा था’ हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक है और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसा कहानीकार हैं जो -‘दुखमय जीवन’ ‘,बुद्धुका कांटा ‘और ‘उसने कहा था’ सिर्फ तीन कहानियां लिखकर अमर हो गए।

आज प्रतिलिपि डाॅट काॅम पर सर्च करते हुए ‘उसने कहा था’ कहानी आगे आ गई।पढ़ने का लालच छोड़ नहीं पाई।जब कहानी समाप्त हुई आँखें आँसुओं से भरी धीं।

हाँ,आज मेरे परिपक्व मन ने जाना क्यों यह कहानी सर्वश्रेष्ठ है!

वृद्धों की कहानी वृद्धों की जुबानी

पिछले दिनों विद्यालय में एक अनूठा कार्यक्रम हुआ ।इसमें गांवों से बुजुर्गो को आमन्त्रित किया गया ।कार्यक्रम का उद्देश्य नई पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी में जो संवादहीनता बढ रही है उस पर परिचर्चा करना था (जिसके कारण युवा इन्टरनेट की स्वप्निल दुनिया में खोया है और बुजुर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं ।)

कार्यक्रम में लगभग बीस वृद्ध पहुँचे।सबने अपने अपने अनुभव बांटे।उनमें से एक थे बुद्धराम जो दूधिया हैं और लगभग बीस वर्षों से घर -घर जाकर दूध डालकर आते हैं ।जब उननसे बोलने को कहा गया तो वे अपनी ग्रामीण बोली में बोले- “भैंस नै चारा डालां तो वा भी सांझ नै दूध की बाल्टी भर देवै;थ्हानै मेह् फीस देवां लत्ता कपड़ा देवां ;अपणा पेट काटके थ्हारी सारी जरूरत पूरी करां अर थेह् माह्नै गुरद्वारा दिखाओ,क्यों?”

बहुत बड़ी बात कही बुद्धराम जी ने।उन्होंने युवा पीढ़ी के सामने एक प्रश्नचिन्ह खड़ा किया कि जब माता पिता अपना पेट काट- काटकर उनकी सब ज़रूरतें पूरी करते हि तो उन्हें बुढ़ापे में ओल्ड एज होम क्यों?

आज युवा पीढ़ी सफलता के कृत्रिम दंभ से इतनी चुंधिया गई है कि अपनी जड़ों को ही भुला बैठी है।वह भूल गई है कि तने, शाखाएं ,पत्ते तभी हरे भरे रह सकते हैं जब तक वे जड़ों से जुड़े हैं ।बडों की उपेक्षा करके वे दौलतवान तो बन सकते हैं परन्तु प्रसन्नता,संतुष्टि व आशीर्वाद से पूर्ण सम्पन्न व्यक्ति नहीं बन सकते ।